कच्छ एक बार अवश्य घूमने जाना

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कच्छ का रण नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा

kutch white desert

“रण” हिन्दी शब्द से आता है (रण) का अर्थ “रेगिस्तान” होता है।

कच्छ का रण गुजरात प्रांत में कच्छ जिले के उत्तर तथा पूर्व में फैला हुआ एक दलदल का वीरान प्रदेश है। यह लगभग 23,300 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह समुद्र का ही एक सँकरा अंग है जो भूचाल के कारण संभवत: अपने मौलिक तल से ऊपर उभड़ आया है और परिणामस्वरूप समुद्र से पृथक हो गया है। सन् 1819 के भूकंप में उत्तरी रण का मध्य भाग किनारों की अपेक्षा अधिक ऊपर उभड़ गया। इसके परिणामस्वरूप मध्य भाग सूखा तथा किनारे पानी, कीचड़ तथा दलदल से भरे है। ग्रीष्म काल में दलदल सूखने पर लवण के श्वेत कण सूर्य के प्रकाश में चमकने लगते हैं। जिसके कारण यह रण सफ़ेद रण से भी जाना जाता है।

कुछ जानकारी कच्छ के बारे में

कच्छ पर सिन्ध के राजपूत राजाओं का शासन था लेकिन बाद में जडेजा राजपूत राजा खेंगरजी के समय में भुज कच्छ की राजधानी बना। ब्रिटिश शासन काल में ही कच्छ में प्राग महल, आइना महल, रंजीत विलास महल, मांडवी का विजय विलास महल बनाये गये। भारत की स्वतंत्रा पर भारत का भाग होने के पूर्व शाही राज्य होने के कारण इस दौरान यहाँ पर काफी विकास के कार्य हुये।

कच्छ में देखने लायक कई स्थान हैं जिसमें कच्छ का सफ़ेद रण आजकल पर्यटकों को लुभा रहा है। इस के अलावा मांडवी समुद्रतट भी सुंदर आकर्षण है। भुज कच्छ की राजधानी है जिसमें कच्छ के महाराजा का आइना महल, प्राग महल, शरद बाग़ पैलेस एवं हमीरसर तलाव भुज में मुख्य आकर्षण है तथा मांडवी में स्थित विजय विलास पैलेस जो समुद्रतट पर स्थित है जो देखने लायक है। भद्रेश्वर जैन तीर्थ और कोटेश्वर में महादेव का मंदिर और नारायण सरोवर जो पवित्र सरोवरों में से एक है वो भी घूमने लायक है।

kutch ran

गुजरात राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2005 में रण उत्सव का प्रारंभ किया गया। शुरू में इसे तीन दिनों के लिए आयोजित किया गया था। परन्तु लोगो के भारी उत्साह और भरी भीड़ को देखते हुए सरकार रण महोत्सव को दो माह तक के लिए आयोजित करने लगी। कच्छ के रण की प्राकृतिक सौंदर्य की तस्वीरें लेने के लिए देश और विदेश से पेशेवर फोटोग्राफर यहाँ आते है। पहली बार यहाँ ऑनलाइन फोटोग्राफी प्रतियोगिता आयोजित की थी। इस उत्सव में ऊंट सफारी, रेगिस्तान बाइकिंग, पैरा मोटरिंग, और लोक संगीत के रूप में लोकगीत भी आकर्षण का केंद्र रहते है।

कच्छ और इसके आस-पास के पर्यटक स्थल

भुजियो डूँगर की पहाड़ियाँ 160 मीचर ऊँची है जहाँ से भुज शहर पूरा दिखता है। इन्ही पहाड़ियों की वजह से इस शहर का नाम भुज पड़ा।

कंडला एक समुद्री बंदरगाह है, जो कच्छ जिला में स्थित है। यह भारत के पश्चिमी तट का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह है। इसे विभाजन के बाद 1950 में बनवाया गया था, क्योंकि कराची का बंदरगाह पाकिस्तान में चला गया। आज यह भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह है और अधिकारियों की अनुमति लेकर यहां घूमा जा सकता है।

कच्छ बस्टर्ड अभयारण्य, जिसे लाला परजन अभ्यारण्य के रूप में भी जाना जाता है। वर्ष 1992 में कच्छ के जखौ गाँव में ओटिडिडे पक्षी परिवार के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षी महान भारतीय तिलोर के संरक्षण के लिये स्थापित किया गया था। महान भारतीय तिलोर एक लुप्तप्राय प्रजाति है जो अभ्यारण्य के घास के मैदानों में छिप जाता है और पर्यटकों के लिये मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है। चिंकारा, जंगली बिल्ली और नीलगाय यहाँ की अन्य पाई जाने वाली प्रजातियाँ है।

aaina mahel

मांडवी कच्छ का प्रमुख बंदरगाह है तथा मुंबई या सूरत के पहले यह गुजरात का भी प्रमुख बंदरगाह था। पूर्वी अफ्रीका, फारस की खाड़ी, मालाबार तट और दक्षिण – पूर्वी एशिया से जहाज यहाँ अरब सागर के इस बंदरगाह पर आते थे।

गुजरात के कच्छ के रण में स्थित जंगली गधा अभ्यारण्य भारत का सबसे बड़ा वन्यजीव अभ्यारण्य है। इसमें विभिन्न प्रजाति के जन्तु और पक्षी पाये जाते है। जिनमें भारतीय जंगली गधे की लुप्तप्राय प्रजाति के साथ-साथ चिंकारा, कैराकल्स और ऐशिया के विशालतम नीलगाय देखे जा सकते है। अभ्यारण्य में इनकी संख्या लगभग 3000 है और ये जानवर अक्सर झुण्ड में देखे जा सकते है, खासतौर से प्रजनन काल में।

नारायण सरोवर वन्यजीव अभ्यारण्य उन अभ्यारणों में शामिल है जिनमें विभिन्न प्रजातियों के साथ-साथ 15 लुप्तप्राय प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं। चूँकि यहाँ केवल कठोर वातावरण के अभ्यस्त जीव ही रह सकते है इसलिये इस अभ्यारण्य में कुछ ऐसे जन्तु पाये जाते हैं जो कहीं और नहीं पाये जाते।

ashapura mata no madh kutch

माता नो मढ़ वह स्थान है जहाँ कच्छ की प्रमुख देवी माँ आशापुरा माता का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है। लखो फुलानी, अजो और अनागोर के पिता के शासनकाल के दो मंत्रीओ ने 14वीं शताब्दी में इस मन्दिर का निर्माण करवाया था। गुजरात के कई इलाकों से भारी संख्या में भक्त इस मन्दिर तक पैदल आते है।

कोटेश्वर महादेव मंदिर गुजरात के लखपत तालुका में कच्छ जिले में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर है। कोटेश्वर की कहानी के अनुसार रावण को उसकी महान आध्यात्मिक शक्ति के लिए एक शिव लिंग, भगवान शिव से वरदान के रूप में मिला था लेकिन अभिमानी रावण से जल्दबाजी में यह शिवलिंग धरती पर गिरा। रावण की लापरवाही को दंडित करने के लिए, यह शिवलिंग अनैक एक हजार समान शिवलिंगों में बदल गया एवं रावण गलत शिवलिंग लेकर चला गया जबकि असली शिवलिंग यहीं कोटेश्वर में रह गया जहाँ कोटेश्वर महादेव का मंदिर मंदिर स्थित है।

लखपत कच्छ का एक छोटा सा कस्बा और उप-जिला है जिसका अर्थ होता है लखपतियों का शहर। यह शहर 18 वीं सदी के लखपत किले की चहारदीवारी में स्थित है। गुजरात और सिन्ध को जोड़ने के कारण यह शहर व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है।

धौलावीरा एक पुरातात्विक स्थल है जो हडप्पा संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था। भुज से करीब 250 किलोमीटर दूर स्थित धौलावीरा यह बात साबित करता है कि एक जमाने में हडप्पा संस्कृति यहां फली-फूली थी। यह संस्कृति 2900 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व की मानी जाती है। सिंधु घाटी सभ्यता के अनेक अवशेषों को यहां देखा जा सकता है। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग इसकी देखरेख करता है।

mandvi beach gujrat

कच्छ मांडवी बीच भुज से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है। यह बीच गुजरात के सबसे आकर्षक बीचों में एक माना जाता है। दूर-दूर फैले नीले पानी को देखना और यहां की रेत पर टलहना पर्यटकों को खूब भाता है। साथ ही अनेक प्रकार के जलपक्षियों को भी यहां देखा जा सकता है। सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा यहां से बड़ा आकर्षक प्रतीत होता है।

पहाड़ी के शिखर पर बने कंठकोट किले का निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था। अलग-अलग समय में इस पर सोलंकी, चावडा और वघेल वशों का नियंत्रण रहा। 1816 में अंग्रेजों ने इस पर अधिकार कर लिया और इसका अधिकांश हिस्सा नष्ट कर दिया। किले के निकट ही कंथडनाथ मंदिर, जैन मंदिर और सूर्य मंदिर को भी देखा जा सकता है।

narayan sarovar

भगवान विष्णु के सरोवर के नाम से चर्चित इस स्थान में वास्तव में पांच पवित्र झीलें है। नारायण सरोवर को हिन्दुओं के अति प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थलों में सामेल किया जाता है। साथ ही इन तालाबों को भारत के सबसे पवित्र तालाबों में गिना जाता है। श्री त्रिकमरायजी, लक्ष्मीनारायण, गोवर्धननाथजी, द्वारकानाथ, आदिनारायण, रणछोडरायजी और लक्ष्मीजी के आकर्षक मंदिरों को यहां देखा जा सकता है। इन मंदिरों को महाराज श्री देशलजी की रानी ने बनवाया था।

भद्रेश्वर जैन मंदिर भद्रावती में स्थित एक प्राचीन जैन मंदिर है। जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अति पवित्र माना जाता है। भद्रावती में 449 ईसा पूर्व राजा सिद्धसेन का शासन था। बाद में यहां सोलंकियों का अधिकार हो गया। उन्होंनें इस स्थान का नाम बदलकर भद्रेश्वर रख दिया।

कच्छ कैसे पहुँचें

वायु मार्ग – कच्छ के लिये निकटतम हवाईअड्डा(एयरपोर्ट) भुज शहर है। भुज और कांदला विमानक्षेत्र कच्छ जिले के दो महत्वपूर्ण एयरपोर्ट है। मुंबई से यहां के लिए नियमित फ्लाइट्स है।

रेल मार्ग – गांधीधाम और भुज में जिले के नजदीकी रेलवे स्टेशन है। यह रेलवे स्टेशन कच्छ को देश के अनेक हिस्सों से जोड़ते है।

सड़क मार्ग – कच्छ सड़क मार्ग द्वारा गुजरात और अन्य पड़ोसी राज्यों के बहुत से शहरों से जुड़ा हुआ है। राज्य परिवहन और प्राईवेट डीलक्स बसें गुजरात के अनेक शहरों से कच्छ के लिए चलती रहती है।

कच्छ आने का सर्वोत्तम समय

कच्छ आने का सबसे बढ़िया समय सर्दियों का मौसम है।

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